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चिंता कोरोना की, चर्चा चुनाव की

by admin

अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी बिहार में विधानसभा चुनाव रोकने की याचिका खारिज कर दी है। कहा है, यह चुनाव आयोग का विशेषाधिकार है। ऐसे में लगभग तय मानिए की नवम्बर में दो या तीन चरणों में चुनाव सम्पन्न हो जाएंगे। तब भारत ही नहीं पूरे विश्व में बिहार ऐसा इकलौता प्रांत हो जाएगा, जहां कोरोना काल में चुनाव होंगे। यह देश के अन्य प्रांतों, यहां तक की अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी नजीर की तरह पेश किया जाएगा।
जो लोग चिंता जता रहे हैं कि इस दौर में चुनाव कराए गए तो कोरोना का कम्युनिटी प्रसार हो जाएगा। शायद उन्हें जमीनी हकीकत नहीं पता, या जान-बूझकर इस ओर से आंखें चुरा रहे हैं। सरकार व शासन की लाख सख्ती व दंड के प्रावधान के बावजूद लोग मान नहीं रहे। ऐसे में तीन माह बाद चुनाव के कारण ही कोरोना का प्रसार हो जाए, समझ के परे है। आम वोटर भी यह जान-समझ रहा है। सत्ता पक्ष कोरोना व लॉक डाउन के दौरान राहत कार्य और 15 साल के दौरान किए गए विकास कार्य के बूते जनता के बीच उतर चुका है। वहीं विपक्ष (महागठबंधन) नाकामियां गिना रहा है। विपक्ष ने बिहार के विकास का अपना कोई विजन नहीं पेश किया है। यह बात समाज के मुखर वोटरों के गले नहीं उतर रही। वे बिना स्पष्ट सोच, एजेंडे व नीतियों वाले गठबंधन को कतई वोट नहीं देने वाले। एक मुखर वोटर कम से कम 10 सामान्य समझ वाले वोटरों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। जाहिर है, जनादेश किस ओर जाएगा।
दूसरा सबसे अहम पहलू महागठबंधन में अभी तक सीट बंटवारे का कोई स्पष्ट फार्मूला तय नहीं होना और चुनाव के पहले पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी का अलग राह पकड़ना है। इधर, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने खुले मंच से यह कहकर तमाम आशंकाओं को निर्मूल कर दिया है कि नीतीश ही बिहार में राजग का चेहरा होंगे। अभी जो दिख रहा है, उसके मुताबिक जद यू और भाजपा आपस में सीटों का बंटवारा करेगी। भाजपा अपने कोटे से लोजपा को सीटें देगी, वहीं जद यू अपने खाते में मांझी की पार्टी हम को एडजस्ट करेगी। लड़ाई अंततः जातीय खांचे पर ही टिक जानी है। दोनों तरफ से जातियों व धर्म के ब्रांड एम्बेसडर तैयार हैं। देखना बस इतना है कि वोटर किसे अपना वास्तविक क्षत्रप मानती है। मुख्यमंत्री नीतीश के पक्ष में एक बात सबसे मजबूत है। वे हर जाति व धर्म में स्वीकार्य हैं। थोड़ा कम-थोड़ा ज्यादा। पर नगण्य नहीं।

चुनाव शुरू होने में लगभग तीन महीने ही बचे हैं, लेकिन निरंतर बढ़ते कोरोना संक्रमण के कारण इसके नियत समय पर होने पर संशय के बादल भी मंडरा रहे हैं। सीएम नीतीश कुमार की अगुआई में भाजपा ने तो चुनाव की तैयारियां ज़ोर-शोर से शुरू भी कर दी हैं, लेकिन महागठबंधन नहीं चाहती कि फिलहाल चुनाव हो। विपक्ष का मानना है कि अभी जनता के बीच जाने का सही समय नहीं है। विपक्ष का कहना है कि ऐसे समय में, जब कोरोना वायरस संक्रमण ने विकराल रूप धारण कर लिया है और राज्य में मृतकों की संख्या दिनोदिन बढ़ती जा रही है, चुनाव करवाना जनता के साथ खिलबाड़ करने जैसा है। लालू प्रसाद के अनुपस्थिति में राजद की कमान संभालने वाले तेजस्वी प्रसाद यादव ने आरोप लगाया है कि नीतीश कुमार सत्ता बचाने के लिए लाशों के ढेर पर चुनाव करवाना चाहती हैं। उनके अनुसार, बिहार कोरोना संक्रमण से सबसे बुरी तरह से ग्रस्त है और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को आशंका है कि जांच की संख्या अत्यंत कम होने और लचर स्वास्थ्य व्यवस्था की वजह से आने वाले दिनों में स्थिति भयावह हो सकती है। अगर जरूरत पड़े तो राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।
विपक्ष का कहना है कि सीएम को बिहारवासियों के स्वास्थ्य की बिलकुल चिंता नहीं है, अगर चिंता है तो कुर्सी की। हम नहीं चाहते कि तीन महीने बाद लोग पोलिंग बूथ की बजाय श्मशान जाएं। हालांकि अगर स्वस्थ्य होने वालों के आंकड़ों पर नजर डाले तो लगता है कि सब जल्द ही ठीक हो जाएगा। दूसरी तरफ डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी तेजस्वी की तुलना ऐसे कमजोर विद्यार्थी से करते हैं जो परीक्षा टालने के बहाने सदैव खोजता रहता है। वे कहते हैं, “विधानसभा चुनाव समय पर हों या टल जाएं, एनडीए चुनाव आयोग के निर्णय का पालन करेगा। हम हर स्थिति के लिए तैयार हैं, लेकिन जैसे कमजोर विद्यार्थी परीक्षा टालने के मुद्दे खोजते हैं, वैसे ही राजद अपनी संभावित हार को देखते हुए चुनाव टालने के बहाने खोज रहा है।”

सुशील मोदी के अनुसार, चुनाव में तीन महीने से ज्यादा का समय है, इसलिए इस मुद्दे पर ज्यादा सोचने के बजाय कोरोना संक्रमण से निपटने पर ध्यान देना चाहिए। एनडीए नेताओं का कहना है कि इस संबंध में चुनाव आयोग का जो भी फैसला होगा, वह सबको मान्य होना होना चाहिए। लेकिन एनडीए का घटक दल, केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी विपक्ष के साथ है। पार्टी अध्यक्ष चिराग पासवान ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा है कि कोरोना संक्रमण के कारण न सिर्फ लोगों को खतरा होगा बल्कि मतदान प्रतिशत भी काफी कम होगा।

चुनाव आयोग के लिए यह फैसला आसान नहीं है। उसने पिछले महीने नियत समय पर चुनाव होने की बात कही थी, लेकिन विपक्ष का कहना है कि परिस्थितियां अब बिलकुल बदल गई हैं। वे डिजिटल माध्यम से भी चुनाव कराने का विरोध कर रहे हैं। फिलहाल, आयोग ने राज्य के प्रमुख राजनैतिक दलों से चुनाव प्रचार के तरीकों को लेकर उनके सुझाव मांगे हैं, ताकि इस संबंध में कोई फैसला किया जा सके।
इसमें दो राय नहीं है कि बिहार में जुलाई में कोरोना संक्रमण की संख्या में अचानक उछाल आया है, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई-सी लगती है। 16 जुलाई से पूरे बिहार में एक महीने के लिए फिर लॉकडाउन लगाया गया, लेकिन स्थिति संभलने का नाम नहीं ले रही है। पटना स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से लेकर विम्स,पावापुरी सहित तमाम राजकीय अस्पताल मरीजों से भरे पड़े हैं। पिछले दिनों बिहार सरकार के गृह विभाग में कार्यरत अवर सचिव उमेश रजक का एम्स के बाहर भर्ती होने का इंतज़ार करने का एक वीडियो वायरल हो गया, जिसने स्थिति की भयावहता को उजागर किया। वीडियो वायरल होने के बाद अस्पताल में उनकी भर्ती तो हो गई लेकिन उन्हें बचाया न जा सका। राज्यभर से ऐसे कई मामले प्रकाश में आए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सीएम ने पटना के कई निजी अस्पतालों में कोरोना का इलाज करने की पहल की है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह कहना मुश्किल है कि स्थिति आगामी चुनाव तक नियंत्रण में आ जाएगी।

विपक्ष ने मुख्यमंत्री पर निजी राजनैतिक स्वार्थों के कारण कोरोना संकट की अवहेलना करने का आरोप लगाया है, लेकिन इससे बेअसर, जद-यू और भाजपा ने वर्चुअल रैलियों के साथ प्रचार शुरू कर दिया है। सीएम खुद वर्चुअल चुनाव प्रचार का आगाज करने वाले थे, लेकिन फिलहाल इसे टाल दिया गया है। दूसरी ओर, राजद या इसकी किसी सहयोगी पार्टी ने डिजिटल प्रचार के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। तेजस्वी का कहना है कि अगर भाजपा-जद-यू पूरी तरह आश्वस्त हैं कि बिहार में कोरोना कोई समस्या नहीं है और चुनाव समय पर ही होने चाहिए, तो उन्हें वर्चुअल नहीं, परंपरागत रूप से चुनाव प्रचार करने की पैरवी करनी चाहिए। वह डर रहे हैं कि अगर किसी कारणवश चुनाव टलता है तो राष्ट्रपति शासन में भाजपा उनके साथ वह सब करेगी, जो उन्होंने पिछले वर्षों में भाजपा के साथ किया। लेकिन नीतीश कुमार भी कम नहीं है। उनकी चाणक्य नीति से सभी बाकिफ है। विकास के बूते चुनावी नैया कैसे पार लगानी है,वे भली भांति जानते है। अगर देखा जाए तो बिहार में अभी भी नीतीश एक मजबूत विकल्प है।
सोशल मीडिया व ट्विटर के सहारे राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव नीतीश और जद-यू नेताओं की वर्चुअल रैलियों पर ट्विटर के जरिए निशाना साधा है। राजद प्रमुख ने ट्वीट किया, “बिहार में कोरोना के कारण स्थिति दयनीय, अराजक और विस्फोटक है। स्वास्थ्य व्यवस्था दम तोड़ चुकी है। कोरोना नियंत्रण के लिए सरकार को बाज बनना था लेकिन जद-यू नेता लोगों का शिकार करने के लिए ‘गिद्ध’ बनकर रैली कर रहे हैं। मुख्यमंत्री चार महीने में चार बार भी आवास से बाहर नहीं निकले।”

बिहार में नवंबर के अंतिम सप्ताह में नई सरकार का गठन हो जाना निर्धारित है। विशेषज्ञों के अनुसार, चुनाव टलने की स्थिति में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है और उस अवधि में सत्ता की बागडोर परोक्ष रूप से भाजपा के हाथों होगी। एनडीए नेता राजद नेताओं के चुनाव टालने के तर्क को हास्यास्पद करार देते हैं। जद-यू के प्रधान राष्ट्रीय महासचिव के.सी. त्यागी कहते हैं कि जब अमेरिका में इस परिस्थिति में चुनाव हो सकते हैं तो बिहार में क्यों नहीं? वे इसे विपक्ष का डर और घबराहट से उपजा कुतर्क करार देते हैं। जवाब में तेजस्वी पूछते हैं कि क्या सीएम बिहार में अमेरिका से अधिक लोगों को मरवाना चाहते हैं? वे यह भी कहते हैं कि अमेरिका में चुनाव परंपरागत रूप से बैलेट पेपर से होते हैं, न कि ईवीएम से। वैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी अब अपने देश में चुनाव स्थगित करने की वकालत करने लगे हैं। सच्चाई यह है कि बिहार में मात्र 34 प्रतिशत आबादी के पास स्मार्टफोन हैं, इसलिए डिजिटल माध्यम से चुनाव होने पर बहुत सारे लोग वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाएंगे।

वही सुशील मोदी कहते हैं कि बिहार में चुनावों में धनबल और बाहुबल का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल कांग्रेस और राजद ने ही किया। “जिनके राज में बिहार बूथलूट और चुनावी हिंसा के लिए बदनाम था, वे आज अपने दाग धोना चाहते हैं। मतपेटी से लालू का जिन्न निकलने का वह दौर क्या चुनाव की पारदर्शिता का परिणाम था?”

एनडीए का कहना है कि बिहार चुनाव पर निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ चुनाव आयोग को है। लोकतंत्र के लिहाज से समय पर चुनाव कराना चुनाव आयोग की चिंता है। कोरोना के दौर में सुरक्षित चुनाव को लेकर चुनाव आयोग काम कर रहा है।”

राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार कोरोना का बढ़ता संकट चुनाव के पूर्व नीतीश सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप उभरा है। अगर कोरोना पर जल्दी काबू न किया गया, तो लोगों के बढ़ते गुस्से का खामियाजा सत्तारूढ़ गठबंधन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उठाना पड़ सकता है। फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

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